CITIZEN NEWS : कृषि, वर्षा और वैदिक ज्योतिष पर डॉ. राघव नाथ झा का प्रभावपूर्ण व्याख्यान, सम्मान-पत्र से विभूषित

Patna :  वेदामृतम् संस्थानम् जयपुर फाउंडेशन द्वारा आयोजित “वेदामृतम् ज्योतिष–वास्तु एवं आयुर्वेद शिखर सम्मेलन–2026” में बिहार के प्रख्यात वैदिक ज्योतिषाचार्य एवं शोधकर्ता डॉ. राघव नाथ झा ने “कृषि, वर्षा और वैदिक ज्योतिष : शास्त्र तथा आधुनिक विज्ञान का समन्वित प्रतिमान” विषय पर अत्यंत सारगर्भित, शोधपरक एवं विचारोत्तेजक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उनके विशिष्ट शास्त्रीय एवं अनुसंधानात्मक योगदान के लिए संस्था की ओर से उन्हें सम्मान-पत्र प्रदान कर अलंकृत किया गया।

डॉ. झा ने संस्कृत विषय में अपना शोधकार्य कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय से पूर्ण किया है। वे वर्तमान में ज्योतिर्वेद विज्ञान, पटना से संबद्ध हैं तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय ज्ञान-परंपरा के समन्वय एवं पुनर्प्रतिष्ठा के लिए सक्रिय हैं।
अपने व्याख्यान का प्रारंभ उन्होंने भगवद्गीता के प्रसिद्ध श्लोक— “अन्नाद् भवन्ति भूतानि, पर्जन्यादन्नसम्भवः…” — के उद्धरण से करते हुए कृषि, वर्षा और यज्ञात्मक कर्म के पारस्परिक संबंध को स्पष्ट किया। उन्होंने ऋग्वेद के पर्जन्य सूक्त, शतपथ ब्राह्मण तथा बृहत्संहिता के संदर्भों के माध्यम से प्रतिपादित किया कि प्राचीन भारतीय मनीषा में वर्षा-चक्र, वाष्पीकरण और मेघ-निर्माण संबंधी वैज्ञानिक संकेत विद्यमान थे।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में वर्षा-पूर्वानुमान का दायित्व भारतीय मौसम विज्ञान विभाग निभा रहा है, जो उपग्रहों, राडारों और संगणकीय प्रतिरूपों के माध्यम से तात्कालिक तथा अल्पकालिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। डॉ. झा ने यह सुझाव भी दिया कि यदि ज्योतिषीय काल-चक्रों के दीर्घकालिक अध्ययन को आधुनिक सांख्यिकीय पद्धतियों के साथ संयोजित किया जाए, तो वर्षा-अनुमान के क्षेत्र में एक नवीन एवं सुदृढ़ प्रतिमान विकसित किया जा सकता है।
अपने व्याख्यान में उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान पटना में प्रस्तावित कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान केंद्र का उल्लेख करते हुए सुझाव दिया कि पंचांग-आधारित वर्षा-सूचनाओं, ग्रह-स्थितियों तथा ऐतिहासिक मानसून आँकड़ों का कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से विश्लेषण किया जाए। इससे कृषि-नीति निर्धारण तथा बाढ़-प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक योजनाओं के निर्माण में महत्वपूर्ण सहायता मिल सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि जिस प्रकार भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में वैश्विक प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुका है, उसी प्रकार काल-विज्ञान और वैदिक ज्योतिष के लिए भी एक समर्पित राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थान की स्थापना समय की आवश्यकता है, जो शास्त्र और प्रयोग के मध्य सुदृढ़ सेतु का निर्माण कर सके।
कार्यक्रम के अंत में संस्था के पदाधिकारियों ने डॉ. झा को सम्मान-पत्र प्रदान कर उनके विद्वत्तापूर्ण योगदान की सराहना की। उपस्थित विद्वानों और प्रतिभागियों ने उनके व्याख्यान को शास्त्र और विज्ञान के समन्वय की दिशा में एक दूरदर्शी एवं सार्थक पहल बताया।
अपने उपसंहार में डॉ. झा ने कहा, “जब पंचांग का संवाद आँकड़ा-विज्ञान से, शास्त्र का संवाद प्रयोगशाला से और कृषि का संवाद काल-विज्ञान से स्थापित होगा, तभी भारत की धरती अन्न, ज्ञान और समृद्धि से परिपूर्ण होगी।”

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