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भारत की पहचान ही कर्तव्यपरायणता, कार्यान्वित करने की क्षमता और ज्ञान है : राज्यपाल केरल, आरिफ मोहम्मद खान।

लहेरियासराय मुख्यालय स्थित प्रेक्षागृह में “भारतीय संस्कृति एवं सार्वभौमिक महत्व” विषय पर एक दिवसीय सेमिनार का हुआ आयोजन।

दरभंगा: दिनांक 10 फरवरी 2024 को लहेरियासराय मुख्यालय स्थित प्रेक्षागृह में “भारतीय संस्कृति एवं सार्वभौमिक महत्व” विषय पर एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन बाबुल कुमार झा की अध्यक्षता में किया गया।


बतौर मुख्य अतिथि केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने दीप प्रज्वलित कर सेमिनार का शुभारंभ करते हुए अपने संबोधन में कहा कि अयोध्या में श्रीराम लला के प्राण प्रतिष्ठा के बाद मिथिला सहित पूरे देश में उत्सवी माहौल है। अयोध्या की कल्पना मिथिला के बगैर नहीं की जा सकती है। भारत की पहचान ही कर्तव्य परायणता, कार्यान्वित करने की क्षमता और ज्ञान है। मिथिला की विशेषता का उल्लेख करते हुए केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि विवेकी सर्वदा मुक्ता, किरतोबो नास्तिवो करक्रिता अलीपा वादन आश्रिते श्री कृष्णों जनेकों तथा इस श्लोक में भगवान कृष्ण और राजा जनक उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई है कि केवल ज्ञान की प्रकाष्ठा ही नहीं थे बल्कि इसके साथ में कर्मयोगी भी थे। आगे उन्होंने कहा कि शनिवार को दरभंगा के हृदयस्थली नेहरू स्टेडियम परिसर स्थित प्रेक्षागृह के ऐसी विशेष जगह पर ऐसे लोगों के बीच में अपनी बात कहने का भारतीय संस्कृति एवं सार्वभौमिकता महत्व विषय पर आयोजित सेमिनार में बोलने का मौका मिला है। दुनिया में प्राचीन कालों से अब तक जितनी भी संस्कृतियों रही है उन्हें हम जानते भी हैं। उदाहरण स्वरूप यूनानी, यूरोपीयन, बेबीलोनियन, मिश्र की संस्कृति है लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार आज का यूनान, मिश्र, सोमालियाई एवं बेबीलोनिया की सभ्यता और संस्कृति था। स्थिति यह है कि उस प्राचीन सभ्यता और संस्कृति से उसका संबंध कट गया। प्राचीन सभ्यता के क्या आदर्श और मूल्य थे। उस भाषा को भी समझने में वर्षों से विशेषज्ञ लगे हुए हैं। भारतीय संस्कृति का खास बात यह है कि इसकी निरंतरता बनी हुई है। आदर्श व मूल्य जो आज से हजारों साल पहले भारतीयों के मानस को प्रेरित करते थे वो आज भी जिंदा है। आज भी उसी तरह वे हमारे मानस को प्रेरित करते हैं। केरल के राज्यपाल खान ने अल्लामा इकबाल का शेर पढ़ते हुए कहा कि यूनानो व मिश्रो वो रोमा मिट गए सभी जहां से, बाकी रहा जो अब तक नामो निसा हमारा। कुछ बात है जो हस्ती मिटती नहीं हमारी, सदियों रहा है दुश्मन दौरे जमां हमारा। उन्होंने कहा कि जगतगुरु शंकराचार्य चार मठ का निर्माण कर सारे देश को एक सूत्र में पिरोया। क्रांतियां मठ से नहीं विचारों से आती है। उदाहरणस्वरूप बताया कि जगतगुरु शंकराचार्य आठवीं शताब्दी में पूरे भारत में सांस्कृतिक और आध्यात्मिक एकता की चेतना पैदा ना की होती तो शायद पूर्व गृह मंत्री सरदार पटेल जिन्हें भारत के यूनीफायर जो एकता को सुदृढ़ करने वाला, जो इतने राज्यों को बिना एक खून की बूंद बहाए हुए सबको इकट्ठा कर दिया। शायद वह काम इनके लिए इतना आसान ना होता। यूनान, मिश्र व बगदाद आदि देश का स्वर्णिम काल भारत के आलोकित पुस्तकों के शब्दों का अरबी अनुवाद से हुआ है। बैतूल हिक्मा नामक संस्था ने प्राचीन भारतीय पुस्तकों का अनुवाद अरबी में किया। दुर्गम काल में भी भारतीयों ने अपनी सभ्यता, संस्कृति और आध्यात्मिक ज्ञान को बचाकर रखा।
मंच संचालन सुशील कुमार ने जबकि धन्यवाद ज्ञापन मौनी बाबा ने किया। मंच पर पातेपुर महंत विश्व मोहन दास, जिला परिषद उपाध्यक्ष ललित झा, पूर्व विधानपार्षद अर्जुन सहनी, जिला परिषद नंद किशोर झा बेचन,युवा भाजपा नेता मुकुंद चौधरी, अवधेश झा, उदयशंकर चौधरी सहित अनेकों लोग उपस्थित थें।

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