नई दिल्ली। डॉ. भीमराव अंबेडकर कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग और नेशनल एकेडमी ऑफ साइकोलॉजी इंडिया के संयुक्त तत्वावधान में डी यू के शंकरलाल हॉल में तीन दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ किया गया। 28 से 30 अक्टूबर तक आयोजित इस संगोष्ठी का विषय समकालीन भारत में मनोविज्ञान के अनुसंधान, शिक्षण और व्यावहारिक प्रयोग को नया स्वरूप देना है। इसमें देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और संस्थानों के शिक्षकों, मनोवैज्ञानिकों तथा शोधार्थियों ने भाग लिया।
महाविद्यालय प्राचार्य प्रो. सदानंद प्रसाद ने स्वागत संबोधन में सभी प्रतिभागियों का अभिनंदन किया। उन्होंने उच्च शिक्षा में शोध और विचारों के आदान-प्रदान को आवश्यक बताते हुए मनोविज्ञान को समाज की वास्तविक जरूरतों से जोड़ने पर बल दिया।
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के पूर्व कुलपति प्रो. गिरिश्वर मिश्र ने उद्घाटन वक्तव्य में कहा कि भारतीय सामाजिक एवं सांस्कृतिक संदर्भों में मनोविज्ञान को समझना आज विशेष महत्त्व रखता है।। दिल्ली विश्वविद्यालय के डीन ऑफ कॉलेजेज प्रो. बलराम पाणि मुख्य अतिथि तथा मनोविज्ञान विभाग की अध्यक्ष प्रो. उर्मी नंदा बिस्वास विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुईं। प्रो. कुमार रवि प्रिया ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम के मुख्य संयोजक डॉ. रवि शंकर रवि हैं।
संगोष्ठी के पहले सत्र में सांस्कृतिक, भारतीय और स्वदेशी मनोविज्ञान पर चर्चा हुई। इसमें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रो. रामनाथ झा, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. सुनीत वर्मा, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के डॉ. नरसिंह कुमार तथा शोधार्थी रिया गनेर और इलाहाबाद विश्वविद्यालय की शोधार्थी अदिति वर्मा ने सहभागिता की। इस सत्र का समन्वय डॉ. शिवंतिका शरद और डॉ. नरसिंह कुमार ने किया।
दूसरे सत्र में संगठनात्मक मनोविज्ञान पर विचार-विमर्श हुआ। बिमटेक की प्रो. मानसी चौधरी, इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रो. चंद्रांशु सिन्हा और भारतीय प्रबंधन संस्थान, शिलांग के प्रो. रोहित द्विवेदी ने कार्यस्थल पर मानवीय व्यवहार, नेतृत्व, प्रेरणा और बेहतर कार्य-संस्कृति जैसे विषयों पर चर्चा की। प्रो. आर. सी. त्रिपाठी ने चर्चाकर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाई।
इस संगोष्ठी का उद्देश्य मनोविज्ञान को केवल सैद्धांतिक अध्ययन तक सीमित न रखकर शिक्षा, मानसिक स्वास्थ्य, सामाजिक जीवन और कार्यस्थल की जरूरतों से जोड़ना है। यह आयोजन विशेषज्ञों और शोधार्थियों को नए विचार साझा करने का अवसर प्रदान कर रहा है। इससे भारतीय समाज की विविधता के अनुरूप मनोविज्ञान के अध्ययन, शिक्षण और व्यावहारिक उपयोग को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।

