DPDP Act 2023 केंद्र की प्राइवेसी कानून से मीडिया परेशान ? सुप्रीम कोर्ट पहुंचे मीडिया संघ एवं मीडिया हाऊस

क़ानून पत्रकारिता को खतरे में डालता है खोजी पत्रकारिता थप हो जाएंगे ?

प्रदीप नायक की रिपोर्ट…

भारत सरकार ने Digital Personal Data Protection Act, 2023 (DPDP Act) लागू किया है। इसका मकसद है की आम नागरिकों के निजी डेटा की सुरक्षा। लेकिन इस कानून के आते ही देश की मीडिया इंडस्ट्री में हलचल मच गई है। आखिर क्यों एक डेटा प्रोटेक्शन कानून से पत्रकार परेशान हैं?
1. क्या है नया कानून?
इस कानून के मुताबिक, किसी भी व्यक्ति का निजी डेटा — जैसे नाम, फोन नंबर, फोटो, लोकेशन, बायोमेट्रिक डेटा — उसकी इजाजत (Consent) के बिना इस्तेमाल या प्रकाशित नहीं किया जा सकता। अगर कोई कंपनी या व्यक्ति इसका उल्लंघन करता है, तो 250 करोड़ रुपये तक का जुर्माना लग सकता है।
सरकार का कहना है कि यह कानून नागरिकों को बड़ी टेक कंपनियों से बचाएगा।
2. मीडिया की 3 बड़ी चिंताएं
पहली चिंता: खोजी पत्रकारिता पर खतरा
अगर कोई पत्रकार भ्रष्टाचार या घोटाले की खबर करता है और उसमें किसी अधिकारी का नाम, फोटो या दस्तावेज दिखाता है, तो क्या उसे पहले उस व्यक्ति से इजाजत लेनी पड़ेगी? मीडिया संगठनों का डर है कि इससे स्टिंग ऑपरेशन और इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म मुश्किल हो जाएगा।

दूसरी चिंता: RTI और पब्लिक रिकॉर्ड
अब तक पत्रकार RTI से मिली जानकारी या सरकारी रिकॉर्ड के आधार पर खबरें बनाते थे। नए कानून में पर्सनल डेटा की परिभाषा बहुत बड़ी है। एडिटर्स गिल्ड का कहना है कि अधिकारी अब RTI का जवाब देने से इनकार कर सकते हैं, यह कहकर कि इससे प्राइवेसी का उल्लंघन होगा।
तीसरी चिंता: सोर्स की पहचान
कानून में डेटा फिड्यूशियरी को डेटा लीक रोकने की जिम्मेदारी दी गई है। इससे व्हिसल ब्लोअर या अंदरूनी सूत्रों से मिली जानकारी को प्रकाशित करना जोखिम भरा हो सकता है।
3. सरकार का पक्ष क्या है?
सरकार का कहना है कि कानून में पत्रकारिता के लिए छूट है। जो डेटा सार्वजनिक हित में है, या जो पहले से ही पब्लिक डोमेन में है, उस पर यह कानून लागू नहीं होगा। IT मंत्रालय ने साफ कहा है कि प्रेस की स्वतंत्रता को कमजोर करने का कोई इरादा नहीं है।
4. असली सवाल क्या है?
सवाल प्राइवेसी और प्रेस फ्रीडम के बीच संतुलन का है। क्या किसी भ्रष्ट नेता की प्राइवेसी, जनता के जानने के अधिकार से बड़ी है? इसका जवाब अभी Data Protection Board of India तय करेगा, जो इस कानून को लागू करेगा।

आलोचकों और मीडिया संघों (जैसे डिजिटल न्यूज़ पब्लिशर्स एसोसिएशन – DNPA) का तर्क है कि अधिकारियों की निजी जानकारी मांगने पर कड़े प्रतिबंधों से सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI) के तहत भ्रष्टाचार उजागर करने में बाधा आएगी। मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे मीडिया संघों पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को नोटिस कर जवाब मांगा है अगली सुनवाई 17 नवंबर को है।

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