CITIZEN AWAZ बिहार के 211 नए डिग्री कॉलेजों में ज्योतिष एवं वेदाङ्ग अध्ययन को स्थान न मिलना दुर्भाग्यपूर्ण : डॉ. राघव नाथ झा

पटना : बिहार सरकार द्वारा राज्य में 211 नए डिग्री कॉलेजों की स्थापना का निर्णय निःसंदेह उच्च शिक्षा के विस्तार की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं स्वागतयोग्य कदम है। किन्तु यह अत्यंत खेद और आश्चर्य का विषय है कि भारतीय ज्ञान-परम्परा के मूलाधार वेद एवं षड्वेदाङ्गों, विशेषकर ज्योतिष शास्त्र को इस नई शैक्षणिक संरचना में कोई स्थान नहीं दिया गया है।ज्योतिषाचार्य डॉ. राघव नाथ झा ने कहा कि आज विश्वभर में पारम्परिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के समन्वय पर बल दिया जा रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भी भारतीय ज्ञान प्रणाली (Indian Knowledge System) को शिक्षा का अभिन्न अंग बनाने की बात करती है। ऐसे समय में बिहार जैसे ज्ञान, दर्शन और शास्त्र की ऐतिहासिक भूमि पर नए महाविद्यालयों की स्थापना के बावजूद वेदाङ्ग एवं ज्योतिष विषयों की उपेक्षा चिंताजनक है।उन्होंने कहा कि ज्योतिष को केवल भविष्यवाणी तक सीमित समझना उसकी व्यापक वैज्ञानिक एवं शास्त्रीय परम्परा के साथ अन्याय है। वेदाङ्ग ज्योतिष भारतीय कालगणना, खगोल अध्ययन, पंचांग निर्माण, ऋतु-निर्धारण, ग्रह-नक्षत्रों की गति, समय प्रबंधन तथा यज्ञीय और सांस्कृतिक जीवन की आधारशिला रहा है। यह भारत की प्राचीन समय-विज्ञान (Science of Time) पर आधारित एक महत्वपूर्ण ज्ञान-शाखा है। डॉ. झा ने कहा कि शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष—ये छह वेदाङ्ग भारतीय ज्ञान-विज्ञान की मूल संरचना हैं। आधुनिक विश्वविद्यालयों में भाषा-विज्ञान, ध्वनि-विज्ञान, व्याकरण, खगोल-विज्ञान, गणित, सांस्कृतिक अध्ययन और मानविकी के जिन विषयों का अध्ययन कराया जाता है, उनकी वैचारिक जड़ें कहीं न कहीं वेदाङ्गों में निहित हैं। उन्होंने कहा कि बिहार की धरती विश्वविख्यात नालन्दा, विक्रमशिला और मिथिला की ज्ञान-परम्परा की उत्तराधिकारी रही है। यह वही भूमि है जहाँ शास्त्रार्थ, दर्शन, न्याय, ज्योतिष और वेदाध्ययन की गौरवशाली परम्परा विकसित हुई। ऐसे राज्य में नए डिग्री कॉलेजों की स्थापना के समय भारतीय ज्ञान-परम्परा के इन मूल विषयों को स्थान न मिलना चिंतन का विषय है।डॉ. झा ने राज्य सरकार, शिक्षा विभाग, विश्वविद्यालयों तथा नीति-निर्माताओं से आग्रह किया कि नवस्थापित महाविद्यालयों में ज्योतिष, वेदाङ्ग, संस्कृत, भारतीय खगोल-विज्ञान, पंचांग अध्ययन तथा भारतीय ज्ञान प्रणाली से संबंधित विभागों एवं पाठ्यक्रमों की स्थापना की जाए। इससे विद्यार्थियों को अपनी बौद्धिक विरासत से जुड़ने का अवसर मिलेगा तथा भारतीय ज्ञान परम्परा पर आधारित शोध एवं नवाचार को भी नई दिशा प्राप्त होगी।उन्होंने कहा कि यदि आधुनिक विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के साथ भारतीय ज्ञान-विज्ञान की परम्पराओं को भी समुचित स्थान दिया जाए, तो बिहार पुनः ज्ञान और शोध की राष्ट्रीय राजधानी बनने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। “जिस भूमि ने विश्व को कालगणना, खगोल अध्ययन और ज्ञान की अनमोल परम्परा दी, उस भूमि के नए महाविद्यालयों में ज्योतिष एवं वेदाङ्गों के लिए स्थान अवश्य होना चाहिए।”

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